सालों से खड़ा यहाँ
हवा में पत्ते लहराता
कितनी ज़िंदगियाँ देखता हूँ
ये कहानी एक बच्चे की
तब यहाँ पक्की सड़क ना थी,
कच्ची थी, हाँ धूप इतनी कड़क ना थी।
माँ के बाल खींचता यहीं स्टेशन से उतर बड़ा सामान उतराता था,
ननिहाल आ, फूल के कुप्पा, वो खूब इतराता था।
कितना कुछ बदल गया ,
रंग नए, ये माहौल नया,
ये पानी और मिज़ाज़ नया,
कुछ तो उसमे ख़ास था, इतने चेहरों में रहता इंतज़ार,
बस एक और हाड़ मांस न था।
माँ के आँचल में छुपता , आँख मिचौली करता,
अपनी माँ से हँसता,लड़ता , मुझे छू कर निकलता था ,
मुझे देखता एकटक , उसमे भी प्यार झलकता था।
देखा है मैंने,
माँ ने नाक भी पोंछा डाँट डपट कर,
और देखा है मैंने ,
उसकी मूछों से गिरता पानी टपक कर ,
आया है कभी वो सोते सोते भी, मांगते देखा खिलौने रोते रोते भी ,
सालों साल बाद आज फिर वो आया है, उसकी माँ पे अब बुढ़ापे का साया है,
देख मुझे वो मंद मंद मुस्काया है, सालों बाद भी बस ये बूढ़ा पेड़ याद आया है ,
आज माँ के आँचल से निकल माँ को आँचल दे रहा है।
सालों साल से खड़ा ये पेड़ आज गर्व से खड़ा हो गया है ,
उम्र तो बढ़ती रही मगर मेरा लाल अब बड़ा हो गया है।