Saturday, March 12, 2016

अभिलाषा

अनजान गलियों में जैसा आगोश में नशे के,दौड़ चलूँ, खींच कर हवा फिर उड़ चलूँ मैं,

 तितलियाँ उड़ाता, कुछ को पकड़ता,
बनूँ पानी और नदी सा बह चलूँ मैं,

पगडंडियों पे मिट्टी उड़ाता,
खुद को सात रंगों में फैलाता चलूँ मैं,

उँगलियों से फूलों को करता स्पर्श,
हो बावला, मुस्कुराता चलूँ मैं,

मदमस्त चिंघाड़ता किसी गज सा,
ये संकीर्णताएँ तोड़ता चलूँ मैं,

जटायें लहराता किसी बेफिक्र योगी सा,
आसमां से बातें करता चलूँ मैं,

बन मछली जल में गोते लगाता,
कुंठाओं को ज़िन्दगी देता चलूँ मैं,

धुंधलें सपनों को करने रंगों के सुपुर्द,
कुछ चुप्पियों को आवाज़ देता चलूँ मैं,

मैं चला दूर क्षितिज तक पंख पसार,
सोचा एक आखिरी सलाम करता चलूँ मैं। 

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