Sunday, May 15, 2016

कालचक्र

सालों से खड़ा यहाँ
हवा में पत्ते लहराता
कितनी ज़िंदगियाँ देखता हूँ
ये कहानी एक बच्चे की 

तब यहाँ पक्की सड़क ना थी,
कच्ची थी, हाँ धूप इतनी कड़क ना थी। 


माँ के बाल खींचता यहीं स्टेशन से उतर बड़ा सामान उतराता था,
ननिहाल आ, फूल के कुप्पा, वो खूब इतराता था। 

कितना कुछ बदल गया ,
रंग नए, ये माहौल नया,
ये पानी और मिज़ाज़ नया,

कुछ तो उसमे ख़ास था, इतने चेहरों में रहता इंतज़ार,
बस एक और हाड़ मांस न था। 

माँ के आँचल में छुपता , आँख मिचौली करता,
अपनी माँ से हँसता,लड़ता , मुझे छू कर निकलता था ,
मुझे देखता एकटक , उसमे भी प्यार झलकता था। 


देखा है मैंने,
माँ ने नाक भी पोंछा डाँट डपट कर,
और देखा है मैंने ,
उसकी मूछों से गिरता पानी टपक कर ,


आया है कभी वो सोते सोते भी, मांगते देखा खिलौने रोते रोते भी ,
सालों साल बाद आज फिर वो आया है, उसकी माँ पे अब बुढ़ापे का साया है,

देख मुझे वो मंद मंद मुस्काया है, सालों बाद भी बस ये बूढ़ा पेड़ याद आया है ,
आज माँ के आँचल से निकल माँ को आँचल दे रहा है। 

सालों साल से खड़ा ये पेड़ आज गर्व से खड़ा हो गया है ,
उम्र तो बढ़ती रही मगर मेरा लाल अब बड़ा हो गया है। 

ओस की बूँद !!!

तू बूँद एक ओस की ,
बस बात ये अफ़सोस की।  

जैसे फिसलती पत्ते से,
नीचे घास में खो जाओगी,
ढूँढूँगा कैसे ?
गिर बस पानी बन जाओगी। 

अभी तो आई बस ठहरी रहो,
कुछ देर तो इस पत्ते की बन के रहो,

बस धूप तक का वक़्त है,
इस पत्ते ने मुरझाना है,
रुकना नहीं, तुमने भी तो वापिस घर चले जाना है। 

बस कुछ पल मिल तो लो, इस पत्ते की सुन तो लो ,
कुम्हलाता तन, हुआ पराया सा मन है , देख लो इधर , मेरे पास वक़्त ज़रा कम है।।