Sunday, May 15, 2016

ओस की बूँद !!!

तू बूँद एक ओस की ,
बस बात ये अफ़सोस की।  

जैसे फिसलती पत्ते से,
नीचे घास में खो जाओगी,
ढूँढूँगा कैसे ?
गिर बस पानी बन जाओगी। 

अभी तो आई बस ठहरी रहो,
कुछ देर तो इस पत्ते की बन के रहो,

बस धूप तक का वक़्त है,
इस पत्ते ने मुरझाना है,
रुकना नहीं, तुमने भी तो वापिस घर चले जाना है। 

बस कुछ पल मिल तो लो, इस पत्ते की सुन तो लो ,
कुम्हलाता तन, हुआ पराया सा मन है , देख लो इधर , मेरे पास वक़्त ज़रा कम है।।

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