Saturday, January 2, 2016

आज़ाद !

उन्मुक्त गगन में दूर क्षितिज पर देख एक पंछी की उड़ान ;विचारों ने बनाया घोंसला,खिली मद्धिम सी मुस्कान।

सोचूं तो मैं भी तो एक पंछी हूँ ,मेरे भी तो पंख हैं ;
परन्तु मेरा  आसमान अब मेरा कहाँ हैं ??
मेरे तो पंख भी उधार के ,
मेरा बसेरा अब मेरा कहाँ है ??

सोने के पिंजड़े  में कैद ,सिमित दायरा ;
कसती  घुटन चाहे जहाँ हूँ ,
उड़ना तो मैं भूल ही गया , अब मैं एक पंछी ही कहाँ हूँ !!

दूर मैदान में दम्भ भरे घोड़े को देख ,
सोचूं तो मैं भी तो घोडा हूँ,मेरी भी तो दौड़ है,

परन्तु अब यह मेरा जंगल नहीं है ,
ये सपने किसी  के ,दौड़ता मैं, यह किसी और की होड़ है।

अब मैं जकड में ,  पकड़ में ,
दौड़ता ,कूदता ,फांदता ,
परन्तु अब ये सिर्फ घुड़दौड़ है।

धुल ,मिटटी में सने अठखेलियां करते बच्चों को देख,
सोचूं ,तो मैं भी तो एक इंसान हूँ ,मेरे भी तो सपने हैं ,

परन्तु मुझ पर ही चलता मेरा ज़ोर कहाँ है??
चारों और झूठ-फरेब ,प्रतिस्पर्धा का शोर बस यहाँ है ,

ना कोई आज़ादी ,मृत सपने,
मैं हर रोज़ एक मौत मरता हूँ ,
एक आज़ाद उड़ान ,एक आज़ाद दौड़ ,एक आज़ाद जीवन ,
बस यही आशा करता हूँ।।।