Friday, March 4, 2016

मशीनी मानव !!!

कुछ लकीरों पे चलता पंगु सा ,याद रखने की होड़ में कुछ भूल सा चला हूँ।

इतनी शिद्दत से गुलाम हूँ ,
के असलियत छोड़ , नक़ल को सफल बनाने चला हूँ।

कुछ फटे पन्ने बिखरे हैं मानस पटल  पर,
मैं खुद को कुछ सुराग देने चला हूँ।

कभी झोली से मुस्कुराहटें फैंकता मासूम सा ,
खुद को समय से समय में लेकर चला हूँ।

अधीन सा हो कुछ कायदों के ,
मैं किसी अनजान को खुद  में भरने चला हूँ।

इस कदर साजिशों से करता गुफ्तगू ,
हरदम मोहरों की बिसात बिछाता चला हूँ।

कुछ पालतू हैं मुगालते भी मेरे ,
अब खुद को ताड़ सा करने चला हूँ।

कुटिलता और मायूसी के महलों से घिरा,
अब मैं इशारे भांप हंसने चला हूँ  !!!

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