Saturday, March 12, 2016

गरीब ज़िन्दगी

किसी का पिता तो किसी की माँ है तू ,
है नादान अगर अब भी बालक नादान है तू ,

बस्ते तो तेरे भी कन्धों पर, मगर ये कायदे कुछ दूसरे हैं ,
बचपन तेरा भांप बना , पैदायशी बदनाम है तू ,

हाथ तो फैलते  हैं ज़रूर, बस किलकारियों से नहीं अलंकृत दुआओं से ,
तेरे सपनों की चिता जला, एक सामाजिक बहिष्कार है तू ,

संख्याओं की गिनती भुला, सिक्कों को बुझाता उलझता समय,
इस कर्म फल की चक्की में पिसा, एक बिकता व्यपार है तू,

आँख मिचौली करती चोरी, पेट भरने की गुलामी करती,
आँखें सफलता की चेष्टा में, और कुछ नहीं बस धिक्कार है तू ,

मासूम सा चेहरा, सालों साल अधेड़ से बयां करता,
तू गरीब या तू पाप का भोगी, जीवन एक बेकार है तू ।।।

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