धुएँ के छल्लों में उड़ता बचपन ,चार छोटे भाइयों का पिता,मैं बड़ा हो गया हूँ।
आँखें खोली और कंधे पे जिम्मेदारियाँ, डूबते अरमां,काले मंज़र ,इस धुएँ में मैं भी धुंआ हो गया हूँ। ये जलती बीड़ी ठंडा करती,शायद कुछ पल को भूल जाऊँ,रोटी तो मेरे नसीब में नहीं ,शायद इसी से भूखा सो जाऊँ।
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