Tuesday, July 4, 2017

वीरांगना

माँ तूने मुस्कराहट तो देखी ,
मगर कुटिलता पकड़ ना  पायी।
तूने देते देखा आशीर्वाद,
असली इरादा भांप ना पायी।

आज भी आ जाते हैं वो मेरे सपनों में ,
आशीष देने, छुआ यहाँ वहां अपनों ने,

मैं कभी कभी अपने पति से भी डरती हूँ ,
देख माँ मैं चुप रह तिल तिल मरती हूँ ,

रसोई में आना, देके बहाना खाना बनाने को ,
शिकार तो मैं थी , बस उसकी हवस मिटाने को ,

क्यों ? क्यों तृप्ति एक छोटे बच्चे से ?
वो तो पूजा पाठ भी करते थे अच्छे से ,

नेक, शालीन, दयालु , मुँह पर सबके लिए दुआ है ,
माँ; मगर उसने मेरा हर अंग छुआ है ,

कभी कभी मन करता बस मर जाने का ,
घर से भागती , कारण है बड़ों से शर्माने का ,

अपने से लज्जित पाओं तले जलता अलाव है ,
वस्त्र हर , रिसता खून नहीं , मगर कितने गहरे घाव हैं ,

मैं आज भी थर्रा जाती हूँ उनके आने से ,
सीता बना लील ले, कतराती नज़र मिलाने से ,

तिरस्कृत , अस्वीकृत किया कितनी ही बार मेरे अहम् ने ,
हाँफती, पसीने में तरबतर, सोये उठाया मेरे वहम ने ,

माँ, मैं घायल हूँ , ना मरहम ना लेप हुआ है ,
निर्दोष का बचपन छीन, फिर दो मुंहे समाज में 'रेप' हुआ है।



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